Live Law Hindi

Live Law Hindi

280 articles hindi.livelaw.in ↗
Follow
Live Law Hindi
Live Law Hindi 11h ago · 1 min read
सुप्रीम कोर्ट ने असम पुलिस की कस्टडी में टॉर्चर के आरोपों वाली याचिका पर GD एंट्री और CCTV फुटेज मंगाए

सुप्रीम कोर्ट ने असम पुलिस की कस्टडी में टॉर्चर के आरोपों वाली याचिका पर GD एंट्री और CCTV फुटेज मंगाए

सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार को आदेश दिया कि वह GD डायरी, पुलिस स्टेशन का CCTV फुटेज और गुवाहाटी हाई कोर्ट का पूरा रिकॉर्ड कोर्ट में पेश करें। यह आदेश उस याचिका पर दिया गया, जिसमें गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें दीपांकर गोगोई के साथ कथित कस्टडी टॉर्चर की CBI से जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया गया था। हाल ही में इस मामले में असम सरकार और पांच आरोपी पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ता (मृतक की बहन) को CBI को पक्षकार बनाने की अनुमति दी गई। कोर्ट ने फिलहाल सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने चल रही कार्यवाही पर भी रोक लगाई। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से वकील शाहरुख आलम की दलीलें सुनीं। कोर्ट को बताया गया कि CBI ने अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया। शाहरुख ने कहा कि पुलिस अधिकारियों के खिलाफ तीन जांच हो चुकी हैं - जिनमें हाईकोर्ट और एमिक्स (न्याय मित्र) द्वारा की गई जांच भी शामिल है - लेकिन याचिकाकर्ता के पास इन रिकॉर्ड्स तक कोई पहुंच नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि पुलिस जवाबदेही आयोग ने भी कुछ जांच की थी, जिसकी रिपोर्ट भी साझा नहीं की गई। इस पर कोर्ट ने तीनों रिपोर्ट वकील के साथ साझा करने का आदेश दिया। हालांकि, प्रतिवादी पक्ष के वकील ने एमिकस की रिपोर्ट साझा करने पर आपत्ति जताई। कोर्ट ने आपत्तियों को खारिज कर दिया और आदेश दिया कि पूरा रिकॉर्ड साझा किया जाए। आगे कहा गया, "गुवाहाटी हाईकोर्ट की फाइल से पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित करें। राज्य के वकील सभी संबंधित सामग्री, GD डायरी और CCTV फुटेज (पेन ड्राइव के जरिए) भी रिकॉर्ड पर रखें। अंतरिम आदेश जारी रहेगा।" मामले के संक्षिप्त तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के 19 सितंबर, 2025 के आदेश को चुनौती दी, जिसमें जांच को CBI को सौंपने (कोर्ट की निगरानी में जांच) और मुआवजा देने की उनकी मांग खारिज की गई। याचिकाकर्ता ने गंभीर आरोप लगाए कि मृतक गोगोई को 2023 में लिचुबारी में आर्मी कैंटोनमेंट के पास ग्रेनेड ब्लास्ट और प्रतिबंधित 'यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम' से कथित जुड़ाव के मामले में तत्कालीन एसपी की सीधी देखरेख और भागीदारी में टिटाबार और जोरहाट सरदार पुलिस स्टेशनों के कर्मचारियों ने बार-बार गैर-कानूनी रूप से हिरासत में लिया और थर्ड-डिग्री टॉ

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
'पीड़िता के बयान को आंशिक रूप से स्वीकार और आंशिक रूप से अस्वीकार नहीं किया जा सकता': सुप्रीम कोर्ट ने रेप केस में व्यक्ति को बरी किया

'पीड़िता के बयान को आंशिक रूप से स्वीकार और आंशिक रूप से अस्वीकार नहीं किया जा सकता': सुप्रीम कोर्ट ने रेप केस में व्यक्ति को बरी किया

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (25 सितंबर) को व्यक्ति को रेप के आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी आरोप पर फैसला करते समय कोर्ट पीड़िता की गवाही आंशिक रूप से खारिज नहीं कर सकता और फिर उसी गवाही को आंशिक रूप से स्वीकार करके आरोपी को रेप का दोषी नहीं ठहरा सकता। जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने सेशंस कोर्ट द्वारा अपीलकर्ता को रेप के लिए दोषी ठहराए जाने का फैसला बरकरार रखा। यह दोषसिद्धि पीड़िता की गवाही के उस हिस्से पर आधारित थी, जिसमें उसने शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमति देने से इनकार किया, जबकि सेशंस कोर्ट ने अपीलकर्ता को अपहरण के अपराध से बरी करते समय उसी गवाही को खारिज किया। कोर्ट ने कहा, "IPC की धारा 366 के मकसद से पीड़िता के सबूतों को आंशिक रूप से खारिज करना और IPC की धारा 376 के तहत आरोप साबित करने के मकसद से उसी बयान को आंशिक रूप से स्वीकार करना संभव नहीं है। अगर पीड़िता के सबूत विश्वसनीय हैं तो उन्हें पूरी तरह से स्वीकार किया जाना चाहिए। पीड़िता के बयान को आंशिक रूप से स्वीकार और आंशिक रूप से खारिज नहीं किया जा सकता।" कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़िता का सहमति न देने का बयान ही दोषसिद्धि को बनाए रखने के लिए काफी नहीं है; बल्कि, उसकी गवाही को पूरे संदर्भ में देखा जाना चाहिए। कोर्ट ने आगे कहा, "अगर उसके सबूतों को समग्र रूप से देखा जाए तो निश्चित रूप से यह राय बनाई जा सकती है कि उसका यह बयान कि आरोपी अपीलकर्ता ने उसकी सहमति के बिना जबरन उसके साथ यौन संबंध बनाए, स्वीकार करने लायक नहीं है। पीड़िता का बयान बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं है।" यह मामला इस आरोप से जुड़ा था कि अपीलकर्ता पीड़िता को - जो आठवीं कक्षा में पढ़ रही थी - पहले लुधियाना के एक फ्लैट में और उसके बाद मलेरकोटला की एक बंद पड़ी फैक्ट्री में ले गया, जहां उसने कथित तौर पर उसकी मर्जी के खिलाफ उसके साथ यौन संबंध बनाए। सेशन कोर्ट ने अपील करने वाले व्यक्ति को IPC की धारा 366 के तहत लगे आरोपों से बरी किया। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि पीड़िता नाबालिग थी या उसका अपहरण किया गया। हालांकि, कोर्ट ने उसे IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया और 10 साल की कठोर कैद की सज़ा सुनाई। हाईकोर्ट ने इस सज़ा को बर

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
सुप्रीम कोर्ट ने जहाज़ की ज़ब्ती का आदेश रद्द किया, कहा- सही तरीके से बेयरबोट चार्टर खत्म होने पर डिमाइस चार्टर भी खत्म हो जाता है

सुप्रीम कोर्ट ने जहाज़ की ज़ब्ती का आदेश रद्द किया, कहा- सही तरीके से बेयरबोट चार्टर खत्म होने पर डिमाइस चार्टर भी खत्म हो जाता है

समुद्री और एडमिरल्टी कानूनों के संदर्भ में एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (25 सितंबर) को कहा कि जब जहाज़ का मालिक सही तरीके से डिमाइस या बेयरबोट चार्टर को खत्म करता है तो चार्टर खत्म हो जाता है, भले ही मालिक ने अभी तक जहाज़ का कब्ज़ा वापस न लिया हो। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने एडमिरल्टी (समुद्री दावों का अधिकार क्षेत्र और निपटान) अधिनियम, 2017 की धारा 5(1)(b) और धारा 5(2) के तहत जहाज़ M.V. Nereus Progress की ज़ब्ती से जुड़े विवाद पर सुनवाई की। Nereides Marine Services, BIMCO BARECON 2017 चार्टरपार्टी के तहत जहाज़ की डिमाइस चार्टरर थी। Nereides द्वारा किराया न चुकाने पर मालिक ने 6 नवंबर, 2025 को एक 'एंटी-टेक्निकैलिटी नोटिस' जारी किया और बाद में क्लॉज़ 31 के तहत 13 नवंबर को चार्टर खत्म कर दिया। मालिक ने 19 नवंबर को 'रीपज़ेशन नोटिस' (कब्ज़ा वापस लेने का नोटिस) जारी किया। तूतीकोरिन में जहाज़ का कब्ज़ा वापस लिए जाने से पहले, Om Freight Forwarders Ltd. ने—जिसने Nereides को एक और जहाज़ अलग से चार्टर पर दिया और उससे बकाया राशि का दावा कर रही थी—4 दिसंबर को M.V. Nereus Progress को ज़ब्त करने का आदेश प्राप्त कर लिया। मद्रास हाईकोर्ट ने ज़ब्ती का आदेश रद्द करने से इनकार किया और कहा कि डिमाइस चार्टर आमतौर पर तब तक जारी रहता है, जब तक कि कब्ज़ा वापस न ले लिया जाए या जहाज़ वापस न सौंप दिया जाए। हाईकोर्ट के फैसले से असहमति जताते हुए CJI कांत द्वारा लिखे गए फैसले में मुख्य रूप से BARECON 2017 चार्टरपार्टी के क्लॉज़ 32 का हवाला दिया गया। इस क्लॉज़ में कहा गया कि चार्टर खत्म होने के बाद और कब्ज़ा वापस लेने तक, चार्टरर मालिक के लिए जहाज़ को "सिर्फ़ एक मुफ़्त बेली (gratuitous bailee)" के तौर पर रखेगा। इसका मतलब है कि जो व्यक्ति मुफ़्त बेली के तौर पर जहाज़ रखता है, वह उसी समय उसका डिमाइस चार्टरर नहीं बना रह सकता। कोर्ट ने कहा, "इस बुनियादी अंतर को देखते हुए Nereides एक ही समय में जहाज़ का 'डिमाइस चार्टरर' और 'ग्रैच्युटस बेली' (बिना किसी शुल्क के सामान रखने वाला) दोनों नहीं हो सकता।" कोर्ट ने समझाया कि कॉन्ट्रैक्ट खत्म करना (Termination) और कब्ज़ा वापस लेना (Repossession) दो अलग-अलग बातें हैं। कॉन्ट्रैक्ट खत्म करन

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
Delhi Riots UAPA Case : सुप्रीम कोर्ट ने मीरान हैदर की हाज़िरी वाली ज़मानत शर्त में ढील दी, अन्य शर्तों को हटाने से किया इनकार

Delhi Riots UAPA Case : सुप्रीम कोर्ट ने मीरान हैदर की हाज़िरी वाली ज़मानत शर्त में ढील दी, अन्य शर्तों को हटाने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत की एक शर्त में ढील दी। इस शर्त के तहत दिल्ली दंगों की बड़ी साज़िश के मामले में आरोपी मीरान हैदर को हफ़्ते में दो बार पुलिस स्टेशन क्राइम ब्रांच, जय सिंह मार्ग, नई दिल्ली में अपनी हाज़िरी लगानी पड़ती थी। कोर्ट ने अब उन्हें हर शनिवार को एक बार हाज़िरी लगाने की इजाज़त दी। उन्हें अपनी शादी के कारण 17 और 24 अक्टूबर को हाज़िरी लगाने से भी छूट दी गई। बता दें, जस्टिस कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच�ने 5 जनवरी को हैदर और चार अन्य सह-आरोपियों को ज़मानत दी थी। बेंच ने ज़मानत की 11 शर्तें लगाई थीं, जिनमें यह भी शामिल था कि आरोपी सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट नहीं कर सकते, सार्वजनिक सभाओं में शामिल नहीं हो सकते और किसी भी इलेक्ट्रॉनिक या फिजिकल रूप में कोई पोस्ट या सामग्री नहीं फैला सकते। शर्त 5 (हाज़िरी), 8 (सभा में शामिल न होना) और 9 (पोस्टर फैलाना) में ढील की मांग करते हुए मीरान ने एक मिसलेनियस एप्लीकेशन (विविध आवेदन) दायर की, जिस पर सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ अग्रवाल ने बहस की। उन्होंने कहा कि हफ़्ते में दो बार हाज़िरी लगाने के बजाय, मीरान को हर हफ़्ते शनिवार को हाज़िरी लगाने की इजाज़त दी जा सकती है। उन्होंने तर्क दिया कि आरोपी नौकरी करना चाहता है, इसलिए हफ़्ते के दिनों में हाज़िरी लगाने में मुश्किल होगी। इसके अलावा, ज़मानत की अन्य शर्तों में भी ढील की मांग की गई। शुरुआत में, जस्टिस कुमार ने कहा: "हम किसी भी शर्त में ढील नहीं देंगे, सिवाय उस शर्त के जिसमें कहा गया कि उन्हें अपनी हाज़िरी लगानी है; उस पर हम सोच सकते हैं कि इसे हफ़्ते में एक बार या 10 दिनों में एक बार किया जाए।" जज ने यह भी सवाल किया कि आरोपी नौकरी कैसे करना चाहता है, जबकि उसने एप्लीकेशन में कहा है कि वह पीएचडी करना चाहता है। अन्य शर्तों के बारे में अग्रवाल ने तर्क दिया कि ज़मानत की शर्तों 8 और 9 को शर्त 6 में जोड़ा जा सकता है, जिसके तहत उन्हें किसी गवाह को प्रभावित करने की इजाज़त नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने इन शर्तों में कोई ढील देने से इनकार किया। चूंकि सुनवाई के समय एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू (दिल्ली पुलिस की ओर से) मौजूद नहीं थे, इसलिए मामले को टाल दिया गया। आखिरकार, ASG राजू आए और उन्होंने याचिका का विरोध किया। उन्होंने मज़ाक-मज़ाक में कहा कि आरोपी "पुलिस स्टेशन में शादी कर सकत

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2026 के लिए 'एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड' परीक्षा की घोषणा की, आवेदन 15 अक्टूबर तक स्वीकार किए जाएंगे

सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2026 के लिए 'एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड' परीक्षा की घोषणा की, आवेदन 15 अक्टूबर तक स्वीकार किए जाएंगे

सुप्रीम कोर्ट ने दिसंबर 2026 के लिए 'एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड' (AOR) परीक्षा की सूचना जारी की। यह परीक्षा नई दिल्ली में 19, 20, 22 और 23 दिसंबर 2026 को आयोजित की जाएगी। AOR परीक्षा के लिए बोर्ड ऑफ़ एग्जामिनर्स के सेक्रेटरी और रजिस्ट्रार (J) द्वारा जारी सूचना के अनुसार, यह परीक्षा सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 के ऑर्डर IV के नियम 5(i) और (ii) के तहत, और 'एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड परीक्षा' से संबंधित नियमों के रेगुलेशन 2 के साथ मिलाकर आयोजित की जाएगी। दिसंबर 2026 की परीक्षा उन उम्मीदवारों के लिए खुली है जो AOR परीक्षा नियमों के रेगुलेशन 11(i) या 11(ii) के तहत दोबारा परीक्षा देने के पात्र हैं। इसमें वे उम्मीदवार भी शामिल हैं, जो जून 2025 की AOR परीक्षा के नतीजों के आधार पर मिले अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं। आवेदन 15 अक्टूबर तक जमा करने होंगे सूचना में कहा गया कि ठीक से भरे हुए आवेदन 1 अक्टूबर से 15 अक्टूबर 2026 के बीच ऑफिस के समय में AOR परीक्षा सेल में जमा किए जाने चाहिए। यह सेल सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया, नई दिल्ली के एडमिनिस्ट्रेटिव बिल्डिंग्स कॉम्प्लेक्स के B-ब्लॉक की तीसरी मंज़िल पर कमरा नंबर 308 में स्थित है। आवेदन 15 अक्टूबर 2026 को शाम 5 बजे तक स्वीकार किए जाएंगे। रजिस्ट्री ने आवेदन फ़ॉर्म का फ़ॉर्मेट और साथ में ज़रूरी निर्देश/गाइडलाइंस भी तय कीं। तय की गई AOR परीक्षा फ़ीस ₹750 है, जिसका भुगतान ऑनलाइन करना होगा। चार पेपर होंगे AOR परीक्षा में चार पेपर होंगे: 1. सुप्रीम कोर्ट की प्रैक्टिस और प्रक्रिया 2. ड्राफ़्टिंग 3. वकालत और पेशेवर नैतिकता (Advocacy and Professional Ethics) 4. प्रमुख मामले (Leading Cases) - नोटिस III देखें परीक्षा केवल पेन और पेपर मोड में आयोजित की जाएगी। अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नर द्वारा दो बिलों को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए सुरक्षित रखने के फ़ैसले को चुनौती देने वाले पंजाब की याचिका बंद की

सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नर द्वारा दो बिलों को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए सुरक्षित रखने के फ़ैसले को चुनौती देने वाले पंजाब की याचिका बंद की

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की उस याचिका का निपटारा किया, जिसमें गवर्नर के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसके तहत उन्होंने दो बिलों को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा था। राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि एक बिल को मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया गया और दूसरे बिल पर कुछ सवाल उठाए गए। चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच पंजाब की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें राष्ट्रपति द्वारा कथित तौर पर कोई कार्रवाई न किए जाने के कारण दोनों बिलों को 'मान ली गई मंज़ूरी' (Deemed Assent) घोषित करने की मांग की गई। पंजाब की ओर से सीनियर एडवोकेट शादान फ़रासत ने कोर्ट को बताया कि एक बिल को मंज़ूरी देने से इनकार किया गया, जबकि दूसरे बिल के संबंध में राज्य सरकार से कुछ सवाल पूछे गए। याचिका में शामिल दो बिल हैं - सिख गुरुद्वारा (संशोधन) बिल, 2023 और पंजाब पुलिस (संशोधन) बिल, 2023। फ़रासत ने कोर्ट को बताया कि पंजाब पुलिस बिल वापस कर दिया गया और सिख गुरुद्वारा बिल के संबंध में कुछ सवाल पूछे गए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार उन सवालों का जवाब देने की प्रक्रिया में है और उन्होंने कोर्ट से मामले को दो हफ़्ते के लिए टालने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि अगर मामले की वजह (cause of action) बनी रहती है, तो वे याचिका पर आगे बढ़ेंगे। हालांकि, CJI ने सवाल किया कि कोर्ट को याचिका लंबित क्यों रखनी चाहिए? जस्टिस बागची ने बताया कि यह मुद्दा अब बिलों को मंज़ूरी देने की समय-सीमा से संबंधित राष्ट्रपति के संदर्भ (President's Reference) पर संविधान पीठ के फ़ैसले से तय होता है। फ़रासत ने कहा कि भले ही छह महीने की समय-सीमा अब लागू नहीं होती है। फिर भी अगर देरी होती है तो कोर्ट राष्ट्रपति या गवर्नर को फ़ैसला लेने का निर्देश दे सकता है। जस्टिस बागची ने कहा कि बिल पर विचार करने की अवधि उस तारीख से फिर से शुरू होगी, जिस तारीख को सवाल पूछे गए। इसलिए उन्होंने कहा कि "अब कोई देरी नहीं है"। इसके बाद फ़रासत ने कोर्ट से उनका यह बयान दर्ज करने का अनुरोध किया कि अगर कोई नई वजह (fresh cause of action) पैदा होती है तो पंजाब सरकार फिर से कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएगी। इसके बाद कोर्ट ने रिट याचिका को बेअसर मानते हुए निपटा दिया, साथ ही पंजाब को ज़रूरत पड़ने पर नई क

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
Sultanpur Bar Election | हाईकोर्ट ने बैलेट बॉक्स 'लूटने' के बाद 'ब्लैक शीप' की पहचान के लिए दिया जांच का आदेश

Sultanpur Bar Election | हाईकोर्ट ने बैलेट बॉक्स 'लूटने' के बाद 'ब्लैक शीप' की पहचान के लिए दिया जांच का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुल्तानपुर के ज़िला जज को निर्देश दिया कि वह सुल्तानपुर बार एसोसिएशन चुनाव की गिनती के दौरान बैलेट बॉक्स लूटने में शामिल वकीलों की पहचान करने के लिए जांच करें। इस घटना ने चुनाव प्रक्रिया में बाधा डाली थी। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने ज़िला जज को निर्देश दिया कि वह CCTV फुटेज और अन्य उपलब्ध सबूतों की जांच करें और उन लोगों या वकीलों की पहचान करें, जो इस घटना में शामिल हो सकते हैं। कोर्ट ने सुल्तानपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) को भी निर्देश दिया कि वह इस घटना के संबंध में दर्ज FIR की जांच की निगरानी करें और स्टेटस/प्रगति रिपोर्ट सौंपें। कोर्ट ज़िला बार एसोसिएशन के कामकाज को संभालने के लिए बनाई गई एल्डर्स कमेटी द्वारा दायर एक अर्जी पर सुनवाई कर रहा है। बेंच ने गौर किया कि पिछले महीने दिए गए अपने पहले के आदेशों के अनुसार, चुनाव 9 सितंबर, 2026 को होने थे। कोर्ट के सामने दी गई जानकारी के अनुसार, 9 सितंबर को मतदान शांतिपूर्ण ढंग से हुआ। अगले दिन गिनती शुरू हुई और दोपहर करीब 3:30 बजे तक शांति से चलती रही, तभी गिनती के दौरान मौजूद वकीलों की भीड़ ने कथित तौर पर बैलेट बॉक्स लूट लिए। कोर्ट ने कहा कि इस घटना ने मतदान और चुनाव कराने की पूरी प्रक्रिया को "बेकार" कर दिया। कोर्ट को यह भी बताया गया कि एल्डर्स कमेटी के माध्यम से चुनाव कराने के अपने पहले के आदेशों के बावजूद यह घटना हुई। कोर्ट को बताया गया कि अगली सुबह, उस कमरे का ताला तोड़ दिया गया जहां बैलेट बॉक्स और चुनाव का अन्य सामान रखा गया। कथित तौर पर DVR/CCTV फुटेज के साथ छेड़छाड़ की गई और उसे ले जाया गया। इसके बाद एल्डर्स कमेटी ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर 14 सितंबर, 2026 को कोतवाली सुल्तानपुर पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई। घटना का वीडियो फुटेज वाली एक पेन ड्राइव भी कोर्ट के सामने पेश की गई। बेंच के सामने दी गई जानकारी के अनुसार, फुटेज में वे लोग दिखाई दे रहे थे, जो कथित तौर पर इस घटना में शामिल थे। कोर्ट ने कहा कि यह घटना सुल्तानपुर में डिस्ट्रिक्ट कोर्ट परिसर के अंदर हुई और यह घटना तब हुई जब हाई कोर्ट ने चुनाव कराने का आदेश दिया। बेंच ने कहा कि सबसे पहले उन लोगों की पहचान करना ज़रूरी है, जो इस घटना में शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि पहली नज़र में यह घटना न सिर्फ़ एक अपराध हो सकती है,

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फारूक अब्दुल्ला-JKCA मामले में ED की याचिका खारिज की

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने फारूक अब्दुल्ला-JKCA मामले में ED की याचिका खारिज की

जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही कोई पक्ष आपराधिक अदालत का ध्यान आरोपों में किसी कथित चूक की ओर दिला सकता है, लेकिन CrPC की धारा 216 के तहत आरोपों में बदलाव करने या नए आरोप जोड़ने की शक्ति आखिरकार अदालत के पास ही होती है। इस शक्ति का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से शुरुआती तौर पर प्रस्तावित अपराध के तत्व सामने आते हों। जस्टिस संजय परिहार ने यह टिप्पणी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की रिवीजन याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की। ED ने अपनी उस याचिका को खारिज किए जाने को चुनौती दी थी, जिसमें उसने जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (JKCA) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला और अन्य के खिलाफ पुराने रणबीर दंड संहिता (RPC) की धारा 411 और 424 के तहत आरोप जोड़ने की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने ED की मुख्य मांग खारिज की और कहा कि CBI की चार्जशीट में मौजूद सामग्री से शुरुआती तौर पर किसी भी अपराध के ज़रूरी तत्व सामने नहीं आते हैं। यह मामला JKCA को BCCI (भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड) से मिले फंड के कथित गबन से जुड़े आरोपों से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, BCCI ने JKCA को लगभग ₹112.13 करोड़ भेजे, जिसमें से CBI को कथित तौर पर लगभग ₹43.69 करोड़ का गबन मिला। CBI की चार्जशीट में आरोप लगाया गया कि अहसान अहमद मिर्ज़ा ने JKCA के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला, तत्कालीन महासचिव मोहम्मद सलीम खान और बैंक अधिकारी बशीर अहमद मिसगर के साथ मिलकर कथित तौर पर अनधिकृत लेन-देन के ज़रिए JKCA के फंड को निजी खातों में ट्रांसफर किया। CBI ने आखिरकार 2018 में अपनी चार्जशीट दाखिल की, जिसमें RPC की धारा 120-B, 406 और 409 के तहत आपराधिक साजिश, आपराधिक विश्वासघात और गबन का आरोप लगाया गया। इसके बाद ED ने RPC की धारा 411 और 424 को जोड़ने की मांग की। उनका तर्क था कि CBI की चार्ज-शीट में चोरी का सामान मिलने और बेईमानी या धोखाधड़ी से संपत्ति हटाने या छिपाने की बात भी सामने आई थी। ट्रायल कोर्ट ने इस मांग को ठुकरा दिया। इससे नाराज़ होकर ED ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। उनका तर्क था कि उन्हें हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से यह छूट मिली थी कि वे आरोप जोड़ने के लिए ट्रायल कोर्ट का रुख कर सकते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
'बेहद अफ़सोसनाक': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने MBBS के लिए PwBD योग्यता को लेकर बार-बार हो रहे मुकदमों पर चिंता जताई

'बेहद अफ़सोसनाक': इलाहाबाद हाईकोर्ट ने MBBS के लिए PwBD योग्यता को लेकर बार-बार हो रहे मुकदमों पर चिंता जताई

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज़ एक्ट, 2016' की धारा 57 के तहत पहले से सर्टिफ़ाइड विकलांगता के प्रतिशत को, MBBS कोर्स में बेंचमार्क विकलांगता वाले लोगों के एडमिशन के लिए नेशनल मेडिकल कमीशन की गाइडलाइंस के तहत बने मेडिकल असेसमेंट बोर्ड द्वारा दोबारा तय नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि बोर्ड का काम सिर्फ़ कैंडिडेट की कोर्स करने की क्षमता (फ़ंक्शनल कॉम्पिटेंसी) का आकलन करना है, और विकलांगता को दोबारा मापना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। इस एक्ट की धारा 56 उचित सरकार को विकलांगता के स्तर का आकलन करने के लिए गाइडलाइंस जारी करने और सर्टिफ़ाइंग अथॉरिटी तय करने का अधिकार देती है। साथ ही धारा 57 उस अथॉरिटी को तय करती है - जो इस मामले में ज़िले के चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर हैं। जस्टिस शेखर बी. सराफ़ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने कहा, “यह बेहद अफ़सोसनाक स्थिति है कि 'राइट्स ऑफ़ पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज़ (RPwD) एक्ट, 2016' की धारा 57 के तहत सक्षम अथॉरिटी द्वारा जारी विकलांगता सर्टिफ़िकेट को कानूनी रूप से सबसे ज़्यादा अहमियत और बाध्यकारी होने के बावजूद, यह कोर्ट हर एकेडमिक सेशन में बार-बार दायर होने वाली रिट याचिकाओं से भरा रहता है।” शुभम मिश्रा के पास सुल्तानपुर के चीफ़ मेडिकल ऑफ़िसर का सर्टिफ़िकेट है, जिसमें क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल कंडीशन (बेल्स पाल्सी) के तहत 45% स्थायी विकलांगता दर्ज है और 02.12.2023 को जारी एक यूनिक डिसेबिलिटी ID कार्ड भी है। उन्होंने NEET (UG) 2026 में PwBD कैटेगरी में ऑल-इंडिया रैंक 948 हासिल की। उनके साथ याचिका दायर करने वालों में से एक को गंभीर रूप से सुनने में अक्षमता (प्रोफ़ाउंड हियरिंग लॉस) के लिए 50% और अंधेपन के लिए 40% विकलांगता सर्टिफ़िकेट मिला। काउंसलिंग से पहले, विकलांगता वाले हर कैंडिडेट को फ़ंक्शनल कॉम्पिटेंसी पर योग्यता सर्टिफ़िकेट लेना ज़रूरी है। 11.08.2026 के सर्टिफिकेट के ज़रिए, मेडिकल असेसमेंट बोर्ड ने पाया कि मिश्रा MBBS कोर्स पूरा करने में सक्षम हैं, लेकिन उनकी बेंचमार्क विकलांगता को 45% से घटाकर 20% कर दिया और उन्हें PwD रिज़र्वेशन के लिए अयोग्य माना। अपीलेट मेडिकल PwD असेसमेंट बोर्ड ने 21.08.2026 को इस निष्कर्ष को सही ठहराया। इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि 27.07.2026 को कमीशन

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
सत्य निकेतन PG बिल्डिंग गिरने के मामले में 5 अधिकारी सस्पेंड, ज़िम्मेदारी तय करने के लिए जांच शुरू: MCD ने हाईकोर्ट में बताया

सत्य निकेतन PG बिल्डिंग गिरने के मामले में 5 अधिकारी सस्पेंड, ज़िम्मेदारी तय करने के लिए जांच शुरू: MCD ने हाईकोर्ट में बताया

दिल्ली नगर निगम (MCD) ने शुक्रवार को दिल्ली हाईकोर्ट को बताया कि सत्य निकेतन PG बिल्डिंग गिरने की घटना, जिसमें सात लोगों की मौत हो गई, उसके सिलसिले में नगर निकाय के पांच अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया। यह जानकारी SGI तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच के सामने MCD की ओर से दाखिल स्टेटस रिपोर्ट का हवाला देते हुए दी। उन्होंने कहा कि बिल्डिंग गिरने के हालात की जांच के लिए एक इंक्वायरी शुरू की गई। इसमें बिल्डिंग की मंज़ूरी या परमिशन का स्टेटस, लागू बिल्डिंग बाय-लॉज़ का पालन और संबंधित MCD अधिकारियों की भूमिका (अगर कोई हो) की जांच शामिल है। MCD ने अपने कंप्लायंस हलफनामे में कहा कि घटना के तुरंत बाद इस मामले को सबसे ऊंचे एग्जीक्यूटिव लेवल पर देखा गया और कार्रवाई सिर्फ़ फील्ड-लेवल के कर्मचारियों तक सीमित नहीं रही। मेहता ने कहा कि तुरंत प्रशासनिक कदम उठाते हुए 7 सितंबर को सुपरवाइज़री चेन के पांच अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया। हलफनामे में कहा गया कि दिल्ली सरकार ने घटना की मजिस्ट्रेट से जांच के आदेश दिए हैं, ताकि परमिशन की वैधता, बिल्डिंग बाय-लॉज़ का पालन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका जैसे मुद्दों की जांच की जा सके। MCD ने यह भी कहा है कि संबंधित प्रॉपर्टी के लिए कोई बिल्डिंग प्लान मंज़ूर नहीं किया गया था और इसे MCD की वैध परमिशन के बिना बनाया गया। इसके अलावा, स्टेटस रिपोर्ट में कहा गया कि MCD ने अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी 12 ज़ोन में PG अकोमोडेशन का सर्वे पूरा कर लिया। इसमें 2,453 PG बिल्डिंग, 32,247 कमरे और लगभग 50,529 लोग रहने वाले पाए गए। सर्वे की गई 2,453 PG बिल्डिंग में से MCD ने बताया कि 2,342 देखने में सुरक्षित हैं, 91 में मामूली मरम्मत की ज़रूरत है, 30 में बड़ी मरम्मत की ज़रूरत है और चार खतरनाक पाई गईं, जिन्हें गिराने या स्ट्रक्चरल ऑडिट की ज़रूरत है। इसके अलावा, यह बताया गया कि ज़मीन के ऊपर तीन मंज़िल वाले आठ लोड-बेयरिंग स्ट्रक्चर और ज़मीन के ऊपर चार मंज़िल वाले 77 फ़्रेम वाले स्ट्रक्चर की पहचान अलग से की गई, क्योंकि वे संभावित रूप से कमज़ोर हैं और उन पर कड़ी नज़र रखने की ज़रूरत है। कॉरपोरेशन ने साफ़ किया कि लगभग 50,529 लोगों की संख्या अभी शुरुआती है और संबंधित ज़ोन से मिले डेटा की और जाँच और मिलान के बाद इ

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 12h ago · 1 min read
अनुच्छेद 227 पत्नी के दाम्पत्य अधिकारों की बहाली का मामला रद्द करने की याचिका सुनवाई योग्य नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

अनुच्छेद 227 पत्नी के दाम्पत्य अधिकारों की बहाली का मामला रद्द करने की याचिका सुनवाई योग्य नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए कार्यवाही रद्द करने की मांग वाली याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। [2026 लाइव लॉ (एमपी) 387] जस्टिस अमित सेठ की पीठ ने कहा: "इस न्यायालय की सुविचारित राय है कि याचिकाकर्ता द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर वर्तमान विविध याचिका, जिसमें फैमिली कोर्ट, ग्वालियर के समक्ष हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 9 के तहत प्रतिवादी द्वारा शुरू की गई कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई, सुनवाई योग्य नहीं है। इस प्रकार, जो मुद्दा तैयार किया गया, उसका उत्तर याचिकाकर्ता के खिलाफ दिया गया।" एक पति द्वारा विविध याचिका दायर की गई, जिसमें दावा किया गया कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए पत्नी द्वारा HMA की धारा 9 के तहत कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है। पति के वकील ने आगे तर्क दिया कि जब पति ने पहले HMA की धारा 9 के तहत एक आवेदन दायर किया तो पत्नी ने उसके साथ रहने से स्पष्ट रूप से इनकार किया। पत्नी के वकील ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत पति की याचिका की सुनवाई योग्यता के संबंध में दलील दी। वकील ने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अधीक्षण की शक्ति इस न्यायालय में निहित है। हालांकि, इसका उपयोग वैधानिक उपचारों या अधीनस्थ न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि प्राथमिक मुद्दा यह है कि क्या HMA की धारा 9 के तहत दायर कार्यवाही रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 को लागू किया जा सकता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 10 के तहत वैवाहिक कार्यवाही के लिए फैमिली कोर्ट एक सिविल कोर्ट है। इसलिए फैमिली कोर्ट के आदेश और डिक्री तथ्यों और कानून दोनों पर अपील योग्य हैं, इसलिए HMA की धारा 9 के तहत कार्यवाही सिविल कार्यवाही है। जैकी बनाम टिनी अलियास एंटनी [2014] के मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने दोहराया कि हाईकोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत सिविल/निजी विवाद में दावा रद्द करने का अधिकार है। वर्तमान मामले में अदालत ने कहा कि यह आरोप कि पत्नी ने उसे परेशान करने के लिए HMA की धारा 9 के तहत मुकदमा दायर किया, प्रमुख सबूतों से स्थापित किया जाना चाहिए। इस प्रकार, इस याचिका में हाईकोर्

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 17h ago · 1 min read
बिना सूचना के कार्रवाई न करने पर पुलिस अधिकारी को लापरवाही का दोषी नहीं ठहरा सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

बिना सूचना के कार्रवाई न करने पर पुलिस अधिकारी को लापरवाही का दोषी नहीं ठहरा सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पुलिस अधिकारी को केवल इसलिए लापरवाह नहीं ठहराया जा सकता कि उसने कार्रवाई नहीं की, जबकि उसके पास कार्रवाई की जरूरत बताने वाली कोई सूचना या खुफिया जानकारी ही उपलब्ध नहीं थी। जस्टिस अरिंदम सिन्हा और जस्टिस सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने कहा, “पुलिस सूचना के आधार पर कार्रवाई करती है। कार्रवाई के लिए सूचना का अभाव होने पर कार्रवाई न करना लापरवाही नहीं कहा जा सकता।” कोर्ट ने यह टिप्पणी उस पुलिस अधिकारी की याचिका मंजूर करते हुए की, जिसे बाद में विस्फोटक जमा किए जाने और उससे हुए घातक विस्फोट को रोकने में विफल रहने के आरोप में दंडस्वरूप प्रतिकूल प्रविष्टि दी गई। हाईकोर्ट ने अधिकरण का वह फैसला भी रद्द किया, जिसमें अधिकारी के खिलाफ दी गई सजा बरकरार रखी गई। मामले के अनुसार याचिकाकर्ता संबंधित समय में पुलिस चौकी प्रभारी के पद पर तैनात था। 7 नवंबर 2023 को शादाब नामक व्यक्ति के घर से बड़ी मात्रा में विस्फोटक बरामद किए गए। अवैध रूप से पटाखों के निर्माण और उनके भंडारण के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 286 और विस्फोटक अधिनियम, 1884 की धारा 9बी(1)(ए) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। मामले की जांच बाद में एक उपनिरीक्षक को सौंपी गई, जिसने आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद 22 जनवरी 2024 को शादाब के घर में विस्फोट हुआ। विस्फोट के दौरान कंक्रीट की एक पटिया गिर गई, जिससे दो नाबालिग बच्चों की मौत हो गई। याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप था कि पहले बड़ी मात्रा में विस्फोटक बरामद होने के बावजूद उसने शादाब द्वारा दोबारा विस्फोटक जमा करने और बनाने की कथित गतिविधि की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को नहीं दी और न ही नियमों के अनुसार कार्रवाई की। इसी आधार पर उसके आचरण को “सरकारी कर्तव्य के प्रति लापरवाही, अनुशासनहीनता और मनमानेपन” के रूप में दर्ज किया गया और उसे प्रतिकूल प्रविष्टि दी गई। हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने कहा कि वह केवल चौकी प्रभारी था और विस्फोटकों की पहली बरामदगी से जुड़े मामले का विवेचक नहीं था। उसने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि शादाब के घर पर दोबारा विस्फोटक जमा किए जाने की उसे कोई जानकारी नहीं थी। राज्य सरकार ने इसके विपरीत दलील दी कि विस्फोटकों की पहली बरामदगी के बाद याचिकाकर्ता को अवैध पटाखा निर्माण की जानकारी थी। इसलिए उससे उन लोगों और घरों पर कड़ी निगरानी रखने की अपेक

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 17h ago · 1 min read
प्रधानमंत्री के साथ महिला की कथित आपत्तिजनक तस्वीर शेयर करने का आरोप, दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस सुरक्षा के आदेश दिए

प्रधानमंत्री के साथ महिला की कथित आपत्तिजनक तस्वीर शेयर करने का आरोप, दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस सुरक्षा के आदेश दिए

दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ महिला की कथित अश्लील और आपत्तिजनक तस्वीर बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर किए जाने के मामले में महिला को पुलिस सुरक्षा देने का आदेश दिया। महिला ने आरोप लगाया कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास, अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और रत्ना सिंह ने कथित रूप से उसकी तस्वीर का कृत्रिम रूप से बदलाव कर उसे प्रधानमंत्री के साथ दिखाया और उसे सोशल मीडिया पर शेयर किया, जिसके बाद उसे धमकियां मिलने लगीं। जस्टिस गिरिश कथ पालिया ने चारों आरोपियों को नोटिस जारी करते हुए दिल्ली पुलिस को महिला की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि महिला अपना वर्तमान पता याचिका में सार्वजनिक न करके सही निर्णय लिया। हालांकि, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वह उसी दिन अदालत में मौजूद जांच अधिकारी को अपना सही पता बताए और जांच अधिकारी तत्काल उस पते को संबंधित थाना प्रभारी तक पहुंचाए। कोर्ट ने थाना प्रभारी को महिला को हर संभव और व्यावहारिक तरीके से पूरी पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। अदालत ने मेटा प्लेटफॉर्म्स को भी नोटिस जारी किया और उसके द्वारा संचालित सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से कथित आपत्तिजनक सामग्री तक पहुंच 24 घंटे के भीतर हटाने का निर्देश दिया। महिला की ओर से पेश वकील उमेश शर्मा ने कहा कि उसकी अनुमति के बिना अज्ञात लोगों ने उसकी तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें अत्यंत अश्लील और आपत्तिजनक तरीके से प्रधानमंत्री के साथ दिखाया। आरोप है कि इन तस्वीरों को कॉकरोच जनता पार्टी के हाल में आयोजित प्रदर्शन के दौरान आपत्तिजनक और अपमानजनक नारों के साथ प्रदर्शित किया गया और बाद में सोशल मीडिया पर शेयर किया गया। याचिका में आरोप लगाया गया कि आरोपियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित चेहरा बदलने वाली तकनीक का इस्तेमाल कर महिला का चेहरा एक अत्यंत आपत्तिजनक तस्वीर पर लगाया। इसके बाद कथित तौर पर इस तस्वीर के बैनर बनाकर प्रदर्शन में प्रदर्शित किए गए और इससे जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर डाले गए। महिला का आरोप है कि उसकी तस्वीरों का इस्तेमाल उसकी सहमति के बिना किया गया और उन्हें विभिन्न अश्लील वेबसाइटों पर भी प्रसारित किया गया। उसने दावा किया कि इन तस्वीरों के वायरल होने के बाद उसे लगातार जान से मारने और दुष्कर्म की धमकियां मिल रही

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 17h ago · 1 min read
जस्टिस एससी शर्मा के बेटे का चुनाव आयोग के वकील होने की जानकारी सामने आई, न्यायिक औचित्य पर उठे सवाल

जस्टिस एससी शर्मा के बेटे का चुनाव आयोग के वकील होने की जानकारी सामने आई, न्यायिक औचित्य पर उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के सरकारी वकील होने की जानकारी सामने आने के बाद न्यायिक औचित्य से जुड़े सवाल उठे हैं। जस्टिस शर्मा उन दो मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ का हिस्सा रहे हैं जिनका संबंध चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया और चुनाव आयोग से जुड़े एक अन्य मामले से है। जस्टिस शर्मा उस पीठ में शामिल थे जिसने 2023 के उस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया निर्धारित की गई। 23 सितंबर को जस्टिस शर्मा ने इस मामले को संविधान पीठ के समक्ष भेजे जाने की आवश्यकता बताई जबकि जस्टिस दीपांकर दत्ता की राय इससे अलग थी। इसके बाद मामला संविधान पीठ को भेज दिया गया। जस्टिस शर्मा ने अपनी राय में प्रथम दृष्टया मौजूदा नियुक्ति प्रक्रिया को मंजूरी देते हुए कहा था कि केवल इसलिए चयन समिति को पक्षपाती नहीं माना जा सकता कि उसमें कार्यपालिका का बहुमत है। इसी दिन जस्टिस शर्मा की अध्यक्षता वाली एक अन्य पीठ ने नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम की याचिका पर सुनवाई की थी। रूपम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अप्रैल में हुए श्रमिक प्रदर्शन के सिलसिले में एक छात्र को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लेने के उनके आदेश की आलोचना की गई। हाईकोर्ट ने छात्र को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसकी वसूली रूपम के वेतन से की जानी थी। जस्टिस शर्मा की पीठ ने अंतरिम राहत देते हुए हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों और वेतन से वसूली के आदेश पर रोक लगाई थी। इस मामले में एक अन्य तथ्य भी महत्वपूर्ण है। मेधा रूपम, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। मेधा रूपम की याचिका जस्टिस शर्मा की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाने को लेकर पहले ही सवाल उठे थे, क्योंकि संबंधित विषय की नियमित सुनवाई का रोस्टर इस पीठ के पास नहीं था। वहीं जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली एक अन्य पीठ पहले से संबंधित मामलों की सुनवाई कर रही थी। ऐसे में मौजूदा रोस्टर से अलग जस्टिस शर्मा की पीठ के समक्ष इस मामले को विशेष रूप से सूचीबद्ध किए जाने पर कुछ लोगों ने सवाल उठाए। अब जस्टिस शर्मा के बेटे का चुनाव आयोग से पेशेवर संबंध होने की जानकारी सा

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 17h ago · 1 min read
POCSO केस में वीडियो प्रसारण पर मद्रास हाईकोर्ट की रोक, कहा- 'TRP से ज्यादा जरूरी बच्चों की सुरक्षा'

POCSO केस में वीडियो प्रसारण पर मद्रास हाईकोर्ट की रोक, कहा- 'TRP से ज्यादा जरूरी बच्चों की सुरक्षा'

मद्रास हाईकोर्ट ने शुक्रवार (25 सितंबर) को ग्रेनाइट कारोबारी वीरमणि उर्फ Gem Granite Veeramani से जुड़े POCSO मामले में मीडिया संस्थानों को मामले से संबंधित वीडियो प्रकाशित या प्रसारित करने से रोक दिया। हालांकि, कोर्ट ने मीडिया को मामले के प्रभावों और बाल यौन शोषण जैसे व्यापक मुद्दों पर बहस करने की अनुमति दी है। जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि जांच के महत्वपूर्ण चरण में ऐसे वीडियो का प्रसारण उन अन्य पीड़ित बच्चों पर "chilling effect" डाल सकता है, जो पुलिस के सामने आने से डर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि मीडिया को मामले की रिपोर्टिंग का अधिकार है, लेकिन मीडिया ट्रायल नहीं हो सकता। आरोपी दोषी है या नहीं, इसका फैसला अदालत करेगी, मीडिया नहीं। "TRP से ज्यादा जरूरी जीवन में कुछ और भी है। बच्चों को सुरक्षित रखा जाए। संवेदनशीलता दिखाइए।" कोर्ट ने यह भी कहा कि चैनल मामले पर बहस कर सकते हैं, लेकिन मामले से जुड़े स्पष्ट/आपत्तिजनक वीडियो प्रसारित किए बिना। जांच के दौरान वीडियो प्रसारण पर कोर्ट की चिंता कोर्ट ने कहा कि पुलिस यह भी जांच कर रही है कि मामले में पहले से सामने आए पीड़ितों के अलावा और भी पीड़ित हो सकते हैं या नहीं। ऐसे में जांच से जुड़ी जानकारी, तस्वीरें या वीडियो सार्वजनिक होने से संभावित पीड़ित पुलिस के सामने आने से हिचक सकते हैं। कोर्ट ने मीडिया को यह भी याद दिलाया कि रिपोर्टिंग के अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है—पीड़ित बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ आरोपी के अधिकारों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। हालांकि NGO ने John Doe Order की मांग की थी, कोर्ट ने फिलहाल ऐसा आदेश जारी नहीं किया। इसके बजाय मीडिया को संबंधित वीडियो प्रकाशित/प्रसारित करने से रोकते हुए चैनलों को बाल यौन शोषण के प्रभावों पर सामान्य चर्चा करने की अनुमति दी। SIT को हर सप्ताह प्रेस रिलीज जारी करने का निर्देश कोर्ट ने मामले की जांच कर रही SIT को हर सप्ताह एक प्रेस रिलीज जारी करने का निर्देश दिया, ताकि जनता को जांच में पुलिस द्वारा उठाए जा रहे कदमों की जानकारी मिलती रहे। राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि पुलिस वीडियो लीक करने वाले लोगों की पहचान करने की प्रक्रिया में है और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने यह भी कहा कि वीडियो पुलिस की ओर से लीक नहीं हुए हैं। ऑनलाइ

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 18h ago · 1 min read
राज्य बार काउंसिलों की सदस्य संख्या बढ़ाने का मुद्दा अटॉर्नी जनरल को भेजा, सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरे देश में लागू हुआ

राज्य बार काउंसिलों की सदस्य संख्या बढ़ाने का मुद्दा अटॉर्नी जनरल को भेजा, सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरे देश में लागू हुआ

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य बार काउंसिलों की अधिकतम सदस्य संख्या बढ़ाने के मुद्दे पर 2 सितंबर को बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा के मामले में दिया गया उसका आदेश पूरे देश की सभी राज्य बार काउंसिलों पर लागू होगा। कोर्ट ने इस मुद्दे पर अटॉर्नी जनरल से विचार करने को कहा है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ तमिलनाडु बार काउंसिल की अधिकतम सदस्य संख्या 25 से बढ़ाकर 32 करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में राज्य बार काउंसिल में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की मांग की गई। सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट संजय हेगड़े ने कहा कि पंजाब और हरियाणा बार काउंसिल के संबंध में भी इसी तरह का मुद्दा उठने की संभावना है। उन्होंने आग्रह किया कि महाराष्ट्र और गोवा बार काउंसिल से संबंधित 2 सितंबर का आदेश सभी बार काउंसिलों पर लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि इस मामले में विधायी हस्तक्षेप की जरूरत पड़ सकती है, इसलिए मुद्दे को अटॉर्नी जनरल के पास भेजा गया। 2 सितंबर को महाराष्ट्र और गोवा बार काउंसिल से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी राज्य बार काउंसिल की सदस्य संख्या बढ़ाने का सवाल नीतिगत निर्णय से जुड़ा है। इसलिए कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से अनुरोध किया कि वह संबंधित याचिका को अभ्यावेदन के रूप में लें और राज्य बार काउंसिल से विचार-विमर्श के बाद उचित निर्णय करें। मौजूदा याचिका में सुप्रीम कोर्ट के राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं को 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने संबंधी निर्देशों को लागू करने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के 21 जुलाई 2026 के प्रस्ताव को लागू किया जाए, लेकिन एडवोकेट एक्ट, 1961 की धारा 3(2)(बी) के तहत निर्वाचित सदस्यों की वैधानिक संख्या कम न की जाए। याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि जहां आवश्यक हो, राज्य बार काउंसिलों की अधिकतम सदस्य संख्या 32 की जाए, ताकि महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके और इसके लिए योग्यता के आधार पर निर्वाचित उम्मीदवारों को हटाना न पड़े। तमिलनाडु बार काउंसिल के मामले में 21 जुलाई को घोषित चुनाव परिणाम में शीर्ष 25 स्थान हासिल करने वाले उम्मीदवारों को शामिल करने और महिलाओं के प्रतिनिधित्व

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 18h ago · 1 min read
सुप्रीम कोर्ट ने AIMIM विधायक की चुनावी जीत के खिलाफ याचिका खारिज की, 'दुआ' को वोट मांगना नहीं माना

सुप्रीम कोर्ट ने AIMIM विधायक की चुनावी जीत के खिलाफ याचिका खारिज की, 'दुआ' को वोट मांगना नहीं माना

सुप्रीम कोर्ट ने 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मालेगांव सेंट्रल से AIMIM उम्मीदवार मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खलीक के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें उनके चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार शान-ए-हिंद निहाल अहमद की अपील खारिज की। 'दुआ' को वोट मांगना नहीं माना चुनावी विवाद में आरोप लगाया गया था कि चुनाव प्रचार के दौरान मुफ्ती इस्माइल ने राजनीतिक और धार्मिक सभाओं में अपनी चुनावी जीत के लिए 'दुआ' की थी, जिस पर मौजूद लोगों ने 'आमीन' कहा। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह धर्म के आधार पर वोट मांगने और Representation of the People Act, 1951 की धारा 123 के तहत corrupt practice के बराबर है। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि चुनावी जीत के लिए दुआ करना अपने-आप में धर्म के आधार पर वोट मांगना या undue influence नहीं है। 'आमीन' कहना दुआ से सहमति जताना हो सकता है, लेकिन इसे किसी उम्मीदवार को वोट देने की औपचारिक प्रतिज्ञा नहीं माना जा सकता। 162 वोटों से जीते थे मुफ्ती इस्माइल मुफ्ती इस्माइल ने मालेगांव सेंट्रल सीट पर 1,09,653 वोट हासिल किए थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी शेख आसिफ शेख राशिद को 1,09,491 वोट मिले थे। जीत का अंतर केवल 162 वोट था। शान-ए-हिंद निहाल अहमद को 9,624 वोट मिले थे। धार्मिक संगठनों के समर्थन पर भी हाईकोर्ट की टिप्पणी चुनौती में धार्मिक संगठनों द्वारा मुफ्ती इस्माइल की उम्मीदवारी के समर्थन का मुद्दा भी उठाया गया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि राजनीतिक विमर्श में धर्म का संदर्भ पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है और धार्मिक संगठनों के चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के चुनावी भाषणों को लेकर लगाए गए आरोपों पर भी हाईकोर्ट ने कहा था कि उन्हें चुनावी अभियान के दौरान लगे आरोप-प्रत्यारोप के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। पर्चों को लेकर भी आरोप मामले में मुफ्ती इस्माइल की बहन रफीआ खलीक द्वारा कथित तौर पर बांटे गए पर्चों का मुद्दा भी उठाया गया था। आरोप था कि इनमें महिलाओं के चुनाव लड़ने और मुस्लिम महिलाओं के व्यवहार को लेकर धा

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 19h ago · 1 min read
PNB में नौकरी का अनुभव सरकारी कार्यालय का अनुभव नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

PNB में नौकरी का अनुभव सरकारी कार्यालय का अनुभव नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में हासिल किया गया कार्य अनुभव किसी भर्ती विज्ञापन में निर्धारित 'सरकारी कार्यालय' के अनुभव के बराबर नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत किसी संस्था का 'राज्य' की परिभाषा में आना मात्र इस आधार पर उसे 'सरकारी कार्यालय' नहीं बना देता। जस्टिस दिनेश पाठक की पीठ ने यह टिप्पणी सत्य प्रकाश की याचिका खारिज करते हुए की। सत्य प्रकाश ने उच्च शिक्षा विभाग में रजिस्ट्रार के पद के लिए अपनी उम्मीदवारी खारिज किए जाने को चुनौती दी थी। 17 अक्टूबर 2024 के भर्ती विज्ञापन में रजिस्ट्रार पद के लिए उम्मीदवार के पास विश्वविद्यालय, सरकारी कार्यालय या उच्च शिक्षा संस्थान में प्रशासनिक एवं पर्यवेक्षण स्तर पर 15 वर्ष का अनुभव अथवा कॉलेज या विश्वविद्यालय में 15 वर्ष का शिक्षण अनुभव होना आवश्यक है। याचिकाकर्ता के पास 18 वर्ष से अधिक का कार्य अनुभव है। उसका दावा था कि पंजाब नेशनल बैंक संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' की परिभाषा में आता है, इसलिए वहां प्राप्त अनुभव को सरकारी कार्यालय का अनुभव माना जाना चाहिए। यह भी दलील दी गई कि विज्ञापन में 'सरकारी कार्यालय' की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है और राष्ट्रीयकृत बैंकों के कर्मचारी भारतीय दंड संहिता की धारा 21 के तहत 'लोक सेवक' की परिभाषा में आते हैं। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 12 के तहत किसी संस्था का 'राज्य' की श्रेणी में होना और भारतीय दंड संहिता की धारा 21 के तहत उसके कर्मचारियों का 'लोक सेवक' होना, अलग-अलग संवैधानिक और कानूनी संदर्भों में लागू होने वाली अवधारणाएं हैं। इनका इस्तेमाल भर्ती विज्ञापन में प्रयुक्त 'सरकारी कार्यालय' शब्द के अर्थ के समान नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, “किसी संस्था को संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' में शामिल किया जाना मात्र इस बात को स्थापित नहीं करता कि वह निर्धारित पात्रता शर्त के लिए 'सरकारी कार्यालय' है।” पीठ ने यह भी कहा कि अदालत के सामने ऐसा कोई आधार नहीं रखा गया, जिससे यह स्थापित हो सके कि पंजाब नेशनल बैंक एक सरकारी कार्यालय है और उसके कर्मचारी संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत संरक्षित हैं। हाईकोर्ट ने एक पूर्व समकक्ष पीठ के फैसले का भी संज्ञान लिया। उस मामले में बैंक ऑफ बड

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 19h ago · 1 min read
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की मांग वाली याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की मांग वाली याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक भाषा हिंदी करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि केंद्र सरकार को एक आयोग गठित करने का निर्देश दिया जा सकता है, जो सुप्रीम कोर्ट में हिंदी के इस्तेमाल को लेकर सिफारिशें करे। इसके लिए संविधान के कुछ प्रावधानों का हवाला दिया गया। इस पर चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही भाषा संबंधी सुधार धीरे-धीरे लागू कर रहा है। उन्होंने बताया कि अब महत्वपूर्ण फैसलों और रिपोर्ट्स का संक्षिप्त विवरण हिंदी में दिया जा रहा है और आगे अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी शामिल किया जाएगा। चीफ़ जस्टिस ने कहा कि ऐसे बदलाव अदालती आदेश के जरिए नहीं, बल्कि धीरे-धीरे और चरणबद्ध सुधारों के माध्यम से किए जाते हैं। वहीं, जस्टिस वी. मोहना ने कहा कि याचिका में मांगी गई राहत प्रभावी रूप से संवैधानिक संशोधन की मांग करती है। उन्होंने सवाल किया कि कोर्ट ऐसा निर्देश कैसे दे सकता है। वकील ने दोबारा कम-से-कम आयोग गठित करने का निर्देश देने का आग्रह किया। हालांकि, CJI सूर्यकांत ने अंततः कहा—“Dismissed.” क्या कहता है संविधान? संविधान के अनुच्छेद 348(1)(a) के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कार्यवाही सामान्यतः अंग्रेजी में होती है, जब तक संसद कानून बनाकर इसके संबंध में अन्य व्यवस्था न करे। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हिंदी में महत्वपूर्ण फैसलों के सरल सार और दैनिक ऑडियो-वीडियो बुलेटिन उपलब्ध कराने वाली हिंदी जन सूचना सेवा शुरू करने की घोषणा भी की है। इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए क्लिक करें�

Save
Live Law Hindi
Live Law Hindi 20h ago · 1 min read
जब्त वाहन पुलिस छापेमारी के लिए थाने से निकाला, तीन दिन बाद हादसे में महिला की मौत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने DGP को जांच के आदेश दिए

जब्त वाहन पुलिस छापेमारी के लिए थाने से निकाला, तीन दिन बाद हादसे में महिला की मौत: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने DGP को जांच के आदेश दिए

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आबकारी मामले में जब्त किए गए वाहन को पुलिस हिरासत से निकालकर छापेमारी में इस्तेमाल किए जाने और इसके कुछ दिन बाद जानलेवा हादसे में शामिल होने की परिस्थितियों की स्वतंत्र और गोपनीय जांच का आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के DGP को आठ सप्ताह के भीतर जांच पूरी कर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। जस्टिस अनिल कुमार की पीठ ने कहा कि जब्त वाहन को पुलिस हिरासत से बाहर निकालने और उसके बाद हुए हादसे की परिस्थितियां गंभीर सवाल खड़े करती हैं। हालांकि अदालत ने वाहन की जब्ती और कुर्की को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। पीठ ने जिला मजिस्ट्रेट और अपीलीय अदालत के आदेशों में कोई अवैधता या गंभीर त्रुटि नहीं पाई। मामला बुलंदशहर में एक महिंद्रा एक्सयूवी की जब्ती से जुड़ा है। याचिकाकर्ता राहुल उर्फ धर्मदेव पर 19 पेटी देशी शराब ले जाने का आरोप था। उसके खिलाफ उत्तर प्रदेश आबकारी अधिनियम की धाराओं 60 और 63 के तहत FIR दर्ज की गई। इसके बाद वाहन जब्त कर लिया गया और आबकारी अधिनियम की धारा 72 के तहत उसकी कुर्की की कार्रवाई शुरू हुई। जिला मजिस्ट्रेट ने बाद में वाहन को कुर्क करते हुए उसका बाजार मूल्य 6.45 लाख रुपये आंका था। याचिकाकर्ता ने इस आदेश को अपीलीय अदालत में चुनौती दी, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आया कि जब्त वाहन को 4 जून 2021 को रामघाट थाने से बाहर ले जाया गया। राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि तत्कालीन हेड मुहर्रिर सीताराम ने कथित तौर पर दो सिपाहियों पंकज राणा और नरेंद्र सिंह को वांछित आरोपी की तलाश के लिए वाहन उपलब्ध कराया था। यह काम तत्कालीन थाना प्रभारी वीरेंद्र सिंह की जानकारी के बिना किए जाने का दावा किया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि जिस समय वाहन पुलिस के कब्जे में था और उसकी कुर्की की कार्रवाई लंबित थी, उस समय उसे पुलिस हिरासत से बाहर निकालने की परिस्थितियों की जांच जरूरी है। अदालत ने कहा कि यदि वाहन को बिना वैध अधिकार के पुलिस हिरासत से निकाला गया तो यह उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे पुलिसकर्मियों के कर्तव्य का गंभीर उल्लंघन होगा। वाहन 7 जून 2021 को एक हादसे का शिकार हुआ। हादसे में मनोज कुमार के माता-पिता गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मां की मौत हो गई। इसके बाद मथुरा के राया थाने में भा

Save
Language
All languages English Hindi Marathi Gujarati Tamil Telugu Bengali Kannada Malayalam Punjabi Urdu
Open Original ↗